ऑडिट रिपोर्ट से उजागर हुई गड़बड़ी, मजदूरों के भुगतान में भारी अनियमितता
रायपुर (छत्तीसगढ़)। इंदिरा गांधी कृषि विश्वविद्यालय, जोरा में एक बड़ा वित्तीय घोटाला सामने आया है। ऑडिट रिपोर्ट में यह खुलासा हुआ है कि मजदूरों के भुगतान में करीब 3 करोड़ 50 लाख रुपये से अधिक की हेराफेरी की गई है। इस मामले ने न केवल विश्वविद्यालय प्रशासन बल्कि राज्य के शिक्षा और कृषि क्षेत्र को भी हिला कर रख दिया है।

कैसे खुला घोटाले का राज?
सूत्रों से मिली जानकारी के अनुसार, कृषि विश्वविद्यालय में खेतों, प्रयोगशालाओं और कृषि अनुसंधान कार्यों के लिए बड़ी संख्या में मजदूरों की नियुक्ति की जाती है। इन मजदूरों को नियमों के अनुसार मजदूरी दी जाती है। लेकिन ऑडिट जांच के दौरान पाया गया कि मजदूरों को जो भुगतान दिखाया गया है, उसमें भारी गड़बड़ी है।
ऑडिट टीम ने जब दस्तावेज़ और भुगतान से जुड़ी जानकारियाँ मांगीं तो विश्वविद्यालय प्रशासन कई ज़रूरी कागज़ पेश नहीं कर पाया। यही नहीं, जिन मजदूरों के नाम पर भुगतान दिखाया गया था, उनमें से कई असल में कृषि कार्यों में लगे ही नहीं थे।
मजदूरों को अधिकारियों के घरों में लगवाया गया काम
एक चौंकाने वाली बात यह भी सामने आई कि विश्वविद्यालय से जुड़े कुछ मजदूर असल में कृषि कार्यों की बजाय अधिकारियों के निजी बंगलों और आवासों पर तैनात थे। यानी कृषि अनुसंधान और प्रयोगशाला की जगह ये मजदूर सफाई, सौंदर्याकरण और अन्य घरेलू कामों में इस्तेमाल किए जा रहे थे।
विश्वविद्यालय परिसर में भी सौंदर्याकरण के नाम पर 50 से अधिक मजदूरों को काम पर रखा गया था। लेकिन इन पर किए गए खर्च और मजदूरी का रिकॉर्ड पारदर्शी नहीं मिला।
3.50 करोड़ रुपये का हिसाब नहीं दे पाया प्रशासन
रिपोर्ट के मुताबिक, जब ऑडिट टीम ने मजदूरों के भुगतान का ब्योरा माँगा, तो विश्वविद्यालय प्रशासन कोई ठोस दस्तावेज़ उपलब्ध नहीं करा पाया। केवल अनुमानित खर्च और अधूरे रजिस्टर पेश किए गए।
कहा जा रहा है कि मजदूरों को किए गए सालाना भुगतान में से 3 करोड़ 50 लाख रुपये से अधिक की राशि का हिसाब स्पष्ट नहीं है। यही वजह है कि ऑडिट टीम ने इस पर गंभीर आपत्ति दर्ज की है और विश्वविद्यालय प्रशासन से लिखित जवाब मांगा है।
विभागों में मचा हड़कंप
जैसे ही यह रिपोर्ट सामने आई, विश्वविद्यालय के विभिन्न विभागों में हड़कंप मच गया। कई विभागाध्यक्ष और अधिकारी जवाब देने की स्थिति में नहीं हैं। अब विश्वविद्यालय प्रशासन से पूछा जा रहा है कि आखिर मजदूरों को किए गए करोड़ों रुपये के भुगतान का वास्तविक आधार क्या है और यह पैसा किन खातों में गया।
किसानों और छात्रों पर असर
छत्तीसगढ़ जैसे कृषि प्रधान राज्य में यह घोटाला किसानों और छात्रों दोनों के लिए चिंता का विषय है। विश्वविद्यालय का मकसद किसानों को नई तकनीक और शोध से जोड़ना है, ताकि उनकी आय बढ़ सके। लेकिन अगर संस्थान में ही इस तरह की हेराफेरी होगी, तो शोध और शिक्षा पर सीधा असर पड़ेगा।
छात्र संगठन भी इस मामले पर सवाल उठा रहे हैं कि जब विश्वविद्यालय की फंडिंग शोध और शिक्षा के लिए होती है, तो उसे मजदूरों के नाम पर गलत ढंग से क्यों खर्च किया गया।
क्या कह रही है सरकार?
मामले के सामने आने के बाद कृषि विभाग और उच्च शिक्षा विभाग ने भी रिपोर्ट मांगी है। सूत्रों का कहना है कि यदि विश्वविद्यालय प्रशासन संतोषजनक जवाब नहीं दे पाया, तो इस पर सरकारी जांच बैठाई जा सकती है।
बार-बार क्यों सामने आते हैं ऐसे मामले?
विशेषज्ञों का मानना है कि सरकारी विश्वविद्यालयों और संस्थानों में पारदर्शिता की कमी और जवाबदेही न होने के कारण ऐसे मामले अक्सर सामने आते हैं। मजदूरों की संख्या, उनकी उपस्थिति और भुगतान का सही रिकॉर्ड न होने से अधिकारी आसानी से गड़बड़ी कर लेते हैं।
इससे पहले भी राज्य के अन्य संस्थानों में ठेकेदारी और मजदूर भुगतान से जुड़ी गड़बड़ियां पकड़ी जा चुकी हैं।
आगे की राह
यह मामला सिर्फ एक विश्वविद्यालय की गड़बड़ी नहीं है, बल्कि यह उच्च शिक्षा और कृषि अनुसंधान की विश्वसनीयता पर सवाल खड़ा करता है। अगर समय रहते इस तरह के मामलों पर सख्त कार्रवाई नहीं की गई, तो शोध और शिक्षा संस्थानों पर जनता का भरोसा टूट सकता है।
अब देखना होगा कि विश्वविद्यालय प्रशासन इस 3.50 करोड़ रुपये की हेराफेरी का क्या जवाब देता है और क्या सरकार इस पर कोई कठोर कदम उठाती है।
निष्कर्ष
कृषि विश्वविद्यालय जोरा में मजदूरों के भुगतान से जुड़ी इस हेराफेरी ने एक बार फिर यह साबित कर दिया है कि सरकारी संस्थानों में वित्तीय अनुशासन और पारदर्शिता बेहद ज़रूरी है। यह मामला केवल पैसों की हेराफेरी नहीं है, बल्कि किसानों और छात्रों के भविष्य से खिलवाड़ भी है।
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