संक्षेप में
जुलाई के अंत में भारत की जानी-मानी वरिष्ठ वकील और मानवाधिकार कार्यकर्ता इंदिरा जयसिंह ने सुप्रीम कोर्ट के सामने एक महत्वपूर्ण मुद्दा उठाया: भारत में सहमति से सेक्स की क़ानूनी उम्र क्या 18 साल होनी चाहिए या इसमें बदलाव की ज़रूरत है? यह बहस न केवल कानूनी बल्कि सामाजिक और नैतिक स्तर पर भी अहम बन गई है।

क्या है भारत में सहमति से सेक्स की क़ानूनी उम्र?
वर्तमान में भारत में सहमति से यौन संबंध बनाने की कानूनी उम्र 18 साल है। यानी अगर कोई व्यक्ति 18 साल से कम उम्र का है, तो उसकी सहमति को कानूनी मान्यता नहीं दी जाती — भले ही संबंध आपसी सहमति से बनाए गए हों। इसके उलट, इस उम्र से कम के यौन संबंधों को “Statutory Rape” माना जाता है।
इंदिरा जयसिंह का तर्क क्या है?
इंदिरा जयसिंह ने इस मुद्दे पर सुप्रीम कोर्ट के सामने जो तर्क रखे, वो काफी गहरे और विचारोत्तेजक हैं:
1. किशोरों की यथार्थ स्थिति को समझने की ज़रूरत
उन्होंने कहा कि आज की युवा पीढ़ी पहले की तुलना में अधिक स्वतंत्र, शिक्षित और तकनीकी रूप से जागरूक है। ऐसे में 18 साल से कम उम्र के किशोर भी रिश्तों में शामिल हो रहे हैं, और कई बार इनमें आपसी सहमति होती है।
2. POCSO एक्ट में संशोधन का सुझाव
जयसिंह ने सुझाव दिया कि Protection of Children from Sexual Offences (POCSO) Act को “रिस्टिक्टिव” नहीं बल्कि “रिफॉर्मेटिव” बनाना चाहिए। यानी कानून को ऐसे मामलों में किशोरों को अपराधी मानने की बजाय उनकी काउंसलिंग और शिक्षा पर ज़ोर देना चाहिए।
3. 18 साल की रेखा कृत्रिम है?
उनका कहना था कि 18 साल की उम्र को एक कठोर सीमा बनाना व्यवहारिक नहीं है, क्योंकि कई बार 16–17 साल की उम्र के किशोर आपसी सहमति से संबंध में होते हैं। ऐसे में उन्हें अपराधी ठहराना उचित नहीं।
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न्यायपालिका की प्रतिक्रिया
सुप्रीम कोर्ट ने इंदिरा जयसिंह की दलीलों को गंभीरता से सुना और यह संकेत दिया कि यह एक ऐसा विषय है जिस पर समाज, कानून और नीति निर्माताओं को व्यापक रूप से विचार करना चाहिए। कोर्ट ने कहा कि यह मामला सिर्फ व्यक्तिगत स्वतंत्रता का नहीं बल्कि किशोर न्याय प्रणाली, यौन अपराध कानून और सामाजिक मूल्यों से जुड़ा है।
कानूनी परिप्रेक्ष्य: भारत बनाम अन्य देश

1. अंतरराष्ट्रीय तुलना
- अमेरिका के कई राज्यों में 16 साल की उम्र को सहमति की न्यूनतम सीमा माना गया है।
- फ्रांस और जर्मनी जैसे देशों में यह सीमा 15–16 वर्ष के बीच है।
- भारत में यह सीमा 18 साल है — और यह दुनिया में सबसे ऊंची कानूनी सीमाओं में से एक है।
2. POCSO अधिनियम और इसकी सीमाएं
POCSO एक्ट का उद्देश्य बच्चों को यौन शोषण से बचाना है, लेकिन इसका दुरुपयोग भी हुआ है, खासकर आपसी सहमति वाले मामलों में। कई बार माता-पिता या समाज की असहमति के कारण किशोरों को आपराधिक मुकदमों का सामना करना पड़ता है।
सामाजिक पहलू
1. सांस्कृतिक सोच बनाम व्यक्तिगत स्वतंत्रता
हालांकि भारत जैसे देश में जहां यौन शिक्षा को लेकर अभी भी संकोच है, वहां किशोरों के बीच संबंधों को स्वीकार करना एक कठिन सामाजिक चुनौती है। बहुत बार युवा प्रेम संबंधों को समाज “अनैतिक” या “परिवार विरोधी” मान लेता है।
2. किशोरों की मानसिकता
विभिन्न मनोवैज्ञानिक शोध बताते हैं कि 16–17 साल के किशोर अपने निर्णयों में परिपक्वता दिखा सकते हैं। हालांकि, वे हमेशा संभावित खतरों को पूरी तरह नहीं समझते — इसलिए मार्गदर्शन की ज़रूरत है, न कि दंड।
आलोचनाएं और चिंता
इंदिरा जयसिंह के सुझावों पर समाज के कुछ वर्गों ने आपत्ति जताई है:
- बाल सुरक्षा कार्यकर्ता मानते हैं कि सहमति की उम्र कम करने से बाल शोषण के मामलों में वृद्धि हो सकती है।
- कुछ सामाजिक समूहों का मानना है कि ऐसे बदलाव से युवाओं में यौन स्वतंत्रता को अनुचित बढ़ावा मिलेगा, जिससे पारिवारिक और सामाजिक ढांचे पर प्रभाव पड़ सकता है।
संभावित समाधान और सुझाव
इंदिरा जयसिंह ने केवल समस्या नहीं बताई, बल्कि समाधान भी सुझाए:
1. “रोमियो-जूलियट क्लॉज़” की वकालत
कुछ देशों में ऐसा प्रावधान है कि अगर दोनों पक्षों के बीच उम्र का अंतर 2–3 साल से कम है और संबंध सहमति से हुआ है, तो ऐसे मामलों को अपराध नहीं माना जाता। भारत में भी ऐसा कोई विकल्प लाया जा सकता है।
2. यौन शिक्षा और संवाद की ज़रूरत

युवाओं को उनके शरीर, संबंधों और जिम्मेदारियों के बारे में शिक्षित करना ज़रूरी है। ऐसा होने पर वे बेहतर निर्णय ले सकते हैं और समाज भी जागरूक होगा।
3. POCSO कानून में लचीलापन
सभी मामलों को एक ही नजरिए से देखने की बजाय, मामले की परिस्थितियों के अनुसार निर्णय लेने की ज़रूरत है। किशोरों को सुधार की ओर ले जाने वाली व्यवस्था बनानी चाहिए।
निष्कर्ष
भारत में सहमति से सेक्स की उम्र को लेकर चल रही बहस केवल एक कानूनी तकनीकी मुद्दा नहीं है, बल्कि यह समाज, संस्कृति, मानसिकता, स्वतंत्रता और सुरक्षा का सम्मिलित मामला है। इंदिरा जयसिंह जैसे अनुभवी वकील द्वारा इस विषय को उठाया जाना इस बात का संकेत है कि आने वाले समय में इस कानून की समीक्षा जरूरी हो सकती है।
क्या बदलाव होंगे?
यह तो आने वाले महीनों में कोर्ट की टिप्पणियों और सरकार की पहल पर निर्भर करेगा। लेकिन इतना तय है कि “यौन सहमति की उम्र” पर अब चुप्पी नहीं, संवाद और सुधार की आवश्यकता है।
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